बुराइयों में बढती दिलचस्पी

     
    क्यो हर शक्स में बुराईयाॅ ही देखते हो तुम
    अच्छाइयों पर परदा गिराकर ख़ामियाँ गिनाते तुम।
    बस गुस्ताख़ियो के क़िस्से ही उछालते तो हो तुम
    कमजोरियों के पुतले है हम-सब ओर तुम।।
    किसी की कुव्वतों के चरचे सुन न पाते तुम
    ज़ेहन में जलन के अंगारे ही सुलगाते हो तुम।
    ढलती साँझ से होती रातों में अंधेरा ही देखते तुम
    फ़लक पर चमकते तारों की रोशनी न देखते तुम।।
    छीटाकशी की आदतों को दिल में पालते हो तुम
    चापलूसी की अदाओ पर ही मर जाते हो तुम।
    अच्छाइयों बुराइयों से कोई वास्ता न रखते तुम
    बस माखोल उड़ाने की बाज़ीगारी जानते हो तुम।।
    कभी हाथ दिल पर रखकर खुद से पूछो तो तुम
    बुराइयों के क़िस्से की कहानी क्यों गढते हो तुम।
    जो बुरे से बुरे इन्सान में अच्छाईयों को ढूंढो तुम
    तो खुदा का असली चमकता कोहिनूर बनोगे तुम।।
    अगर बुराइयों की जड़ों को ही खोदते रहे ना तुम
    बस त़ेजाब की तरह खुद के जिस्म ही जलाओगे तुम।।

विशेष संदर्भ- कविता में हम तुम का प्रयोग उन लोगों के लिये किया गया है, जो केवल किसी व्यक्ति विशेष के केवल कमजोर पक्ष को देखनें में दिलचस्पी रखते हैं। अंधेरा , उजाला ये दोनों ही किसी भी शक्स के दोनों पक्ष हैं दोस्तों। पर हम शक्स की ख़ामियो पर ही ज़्यादातर नज़र रखते हैं। लैकिन उनकी खूबियो उपलब्धियों को नजरअंदाज ही करते हैं। दुनिया का चाहे कोई कितना बुरा सा बुरा इन्सान क्यों न हो? उसमें कुछ ऐसे गुण ज़रूर होते हैं दोस्तों, जो कि किसी महात्मा में भी शायद न हो। बस अच्छाई को खोजने का साफ़ हदय होना चाहिए।

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